थीसिस चोरी के गुनाहगार राधाकृष्णन

  • महेंद्र यादव 


भारत के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे राधाकृष्णन की सारी प्रसिद्धि उनकी पुस्तक इंडियन फिलॉसॉफी के कारण है। आपको यह जानकारी हैरानी होगी कि ये दोनों भाग चुराए गए थे। राधाकृष्णन के लिखे नहीं थे ।
मूल रूप से वह एक छात्र जदुनाथ सिन्हा की थीसिस थी। राधाकृष्णन उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। थीसिस उनके पास चेक होने आई थी. उन्होंने थीसिस पास करने में दो साल की देरी कर दी। बड़े प्रोफेसर थे, इसलिए किसी ने उन पर शक नहीं किया।

इन्हीं दो सालों में उन्होंने इंग्लैंड में अपनी किताब इंडियन फिलॉसॉफी प्रकाशित करवाई, जो कि उसे बेचारे जदुनाथ सिन्हा की थीसिस ही थी। उस छात्र की थीसिस से राधाकृष्णन की किताब बिलकुल हूबहू है...एक कॉमा तक का अंतर नहीं है। जब उनकी किताब छप गई तभी उस छात्र को पीएचडी की डिग्री दी गई। यानी राधाकृष्णन की किताब पहले छपी...अब कोई यह नहीं कह सकता था कि उन्होंने चोरी की। अब तो चोरी का आरोप छात्र पर ही लगता।

हालांकि जदुनाथ सिन्हा ने हार नहीं मानी। उसने कलकत्ता हाईकोर्ट में केस कर दिया। छात्र का कहना था, “मैंने दो साल पहले विश्वविद्यालय में थीसिस जमा करा दी थी। विश्वविद्यालय में इसका प्रमाण है। अन्य प्रोफेसर भी गवाह हैं क्योंकि वह थीसिस तीन प्रोफेसरों से चेक होनी थी – दो अन्य एक्जामिनर भी गवाह हैं। वह थीसिस मेरी थी और इसलिए यह किताब भी मेरी है। मामला एकदम साफ है...इसे पढ़कर देखिए...."

राधाकृष्णन की किताब में अध्याय पूरे के पूरे वही हैं जो थीसिस में हैं। वे जल्दबाजी में थे, शायद इसलिए थोड़ी बहुत भी हेराफेरी नहीं कर पाए। किताब भी बहुत बड़ी थी- दो भागों में थी। कम से कम दो हजार पेज। इतनी जल्दी वे बदलाव नहीं कर पाए...अन्यथा समय होता तो वे कुछ तो हेराफेरी कर ही देते।

मामला एकदम साफ था लेकिन छात्र जदुनाथ सिन्हा ने कोर्ट के निर्णय के पहले ही केस वापस ले लिया क्योंकि उसे पैसा दे दिया गया था। मामला वापस लेने के लिए छात्र को राधाकृष्णन ने उस समय दस हजार रुपए दिए थे। वह बहुत गरीब था और दस हजार रुपए उसके लिए बहुत मायने रखते थे। दूसरी बात, राधाकृष्णन इतने प्रभावशाली हस्ती थे कि कोई उनसे बुराई मोल नहीं लेना चाहता था। ऐसे में वास्तविक न्याय की उम्मीद जदुनाथ को नहीं रही।

राधाकृष्णन ने अपने छात्र की थीसिस चुराकर इंडियन फिलॉसफी किताब छपवाई। इसमें कलकत्ता की मॉडर्न रिव्यू में छात्र जदुनाथ सिन्हा और उनके बीच लंबा पत्र व्यवहार छपा। राधाकृष्णन सिर्फ यह कहते रहे कि यह इत्तफाक है...क्योंकि शोध का विषय एक ही था..राधाकृष्णन पर लिखी तमाम किताबों में इस विवाद का जिक्र है..एक अन्य प्रोफेसर बी एन सील के पास भी थीसिस भेजी गई थी..ब्रजेंद्रनाथ सील....उन्होंने पूरे मामले से अपने को अलग कर लिया था...बहुत मुश्किल से राधाकृष्णन ने मामला सेट किया..जज को भी पटाया...जदुनाथ को समझाया ...तब मामला निपटा..पहले तो ताव में उन्होंने भी मानहानि का केस कर दिया था...पर समझ में आ गया कि अब फजीहत ही होनी है...इसलिए कोर्ट के बाहर सेटलमेंट करने में जुट गए..बड़े बड़े लोगों से पैरवी कराई,मध्यस्थता कराई। मध्यस्थता कराने वाले एक बड़े दिग्गज श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे, जो तब कलकत्ता यूनिवर्सिटी के कुलपति थे। इतने दबाव के बीच गरीब जदुनाथ सिन्हा कहां टिकते।

थीसिस चोरी के जवाब में राधाकृष्णन सिर्फ इतना ही कहते रहे कि इत्तफाक से जदु्नाथ की थीसिस और मेरी किताब की सामग्री मिलती है..तर्क वही कि स्रोत एक था, विषय एक था...आदि आदि...अपनी किताब को जदुनाथ की थीसिस से अलग साबित नहीं कर पाए...ये मॉडर्न रिव्यू में छपे जदुनाथ के लेखों और राधाकृष्णन के प्रकाशित जवाबों से स्पष्ट होता है। अदालत के बाहर मामला सेटल करा लिया लेकिन जदुनाथ सिन्हा की थीसिस और राधाकृष्णन की किताब में पूरी पूरी समानता ऑन द रिकॉर्ड है। इससे वे इन्कार कर ही नहीं सकते थे। बाद में उन्होंने प्रकाशक से मिलकर (बहुत बाद में, एकदम शुरू में नहीं) यह साबित कराने की कोशिश की, कि किताब पहले छपने के लिए दे दी थी...पर प्रकाशक ने काम बाद में शुरू किया।

यानी सामग्री उनकी किताब की वही थी जो जदुनाथ की थीसिस में थी। एक अन्य प्रोफेसर बी एन सील को भी थीसिस एक्जामिन करने के लिए दी गई थी। उन्होंने पूरे मामले से खुद को अलग कर लिया..क्या करते..राधाकृष्णन के पक्ष में बड़े बड़े लोग थे, सबसे दुश्मनी हो जाती..और अंतरात्मा ने जदुनाथ के दावे का विरोध करने नहीं दिया। नववेदांत के दार्शनिक कृष्णचंद्र भट्टाचार्य भी जदुनाथ सिन्हा के रीडर थे,पर राधाकृष्णन से कौन टकराए।

जदुनाथ के साथ तो अन्याय हुआ, पर जब वो खुद पीछे हट गए तो मामला खत्म ..हमारी आपत्ति ऐसे व्यक्ति को भारत रत्न देने और उसके जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाने पर है। थीसिस चोर डा. सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन के जन्‍मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिन्‍हें ब्रिटिश सरकार से ठीक उसी वर्ष 'सर' की उपाधि मिली थी, जिस वर्ष भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सज़ा हुई थी। राष्‍ट्रीय आंदोलन में तो यह व्‍यक्ति पूरी तरह से नदारद था ही।
1892 में वीरभूम जिले में जन्मे जदुनाथ सिन्हा का देहांत 1979 में हुआ। 

महेंद्र यादव वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं संपादक हैं .

34 comments:

anurag singh said...

agar ye sahi h to kitne dukh aur sharm ki bat hai..is bat ki jaanch honi chahiye..

satya prakash said...

शुक्रिया

satya prakash said...

इतनी शानदार जानकारी देने के लिए शुक्रिया

Unknown said...

Right

Dhammarakshit Bhante said...

Ho agar ye sahi h to kitani sharm ki bat h Osaka jaach hona chahiye.

Manu Raj Trivedi said...

सत्य बेचने को लगा,है झूठा बाजार।
वे ही ठेकेदार हैं जो लबार मक्कार।।
आदरणीय महेंद्र जी,जादूनाथ सिन्हा क्या तुम्हारे फूफाजी हैं कि सौ साल बाद आज उनकी वकालत करने लगे और एक सम्माननीय शख्सियत की बखिया उधेड़ रहे हैं।
अगर ये बात सच भी हो तो इतने साल बाद इसे उखाड़ने का क्या उद्देश्य है और आपको क्या अधिकार है ये सब कहने का?सूरज को दीया दिखलाने से उसकी रौशनी कम नहीं होती।डॉ राधाकृष्णन का जो स्थान समाज व देश में है वो आप जैसे छुटभैयों से नहीं बदला जा सकता।सावधान आगे ऐसी कुचेष्टा न करें।

Manu Raj Trivedi said...

सत्य बेचने को लगा,है झूठा बाजार।वे ही ठेकेदार हैं,जो लबार मक्कार।।
आदरणीय महेंद्रजी ,अगर आपकी बात सच भी हो आज इतने साल बाद इस बात को उखाड़ने से क्या लाभ?
डॉ राधाकृष्णनजी का देश में जो स्थान है वह इन बातों से नहीं बदलेगा।हाँ,जादूनाथ सिन्हा की वकालत करते करते आप अपनी अस्मिता अवश्य खो देंगे,इसलिए सावधान!भविष्य में ऐसी कुचेष्टा न करें।

Manu Raj Trivedi said...

सत्य बेचने को लगा,है झूठा बाजार।
वे ही ठेकेदार हैं जो लबार मक्कार।।
आदरणीय महेंद्र जी,जादूनाथ सिन्हा क्या तुम्हारे फूफाजी हैं कि सौ साल बाद आज उनकी वकालत करने लगे और एक सम्माननीय शख्सियत की बखिया उधेड़ रहे हैं।
अगर ये बात सच भी हो तो इतने साल बाद इसे उखाड़ने का क्या उद्देश्य है और आपको क्या अधिकार है ये सब कहने का?सूरज को दीया दिखलाने से उसकी रौशनी कम नहीं होती।डॉ राधाकृष्णन का जो स्थान समाज व देश में है वो आप जैसे छुटभैयों से नहीं बदला जा सकता।सावधान आगे ऐसी कुचेष्टा न करें।

ajit ambani said...

Unke fufa Ho ya na Ho but apke fufa jarur lag the h Trivedi ji.

ajit ambani said...

Unke fufa Ho ya na Ho but apke fufa jarur lag the h Trivedi ji

Parvez Shaikh said...

सत्य कभी छुपायें तो छुप नही सकता.Real comes out

Dr. RANJAN ZAIDI said...

मित्र, इस देश में पढ़ने-लिखने की संस्कृति नहीं है. 'चोरी और जुगाड़' प्रकृति है. क्या विश्वास करोगे कि गीतांजलि का मूल रचयिता कौन था? क्या विश्वास करोगे कि प्रेम चंद साहित्य के एक विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर (दिल्ली) का सारा साहित्य अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डीलिट एवर्डेड शोध ग्रन्थ की चोरी का है. दिल्ली विश्वविद्यालय में चोरी का कारोबार पुराना है. कहाँ तक शोर मचाएंगे. झूठी डिग्रियों के नाम पर चोर मंत्री बन जाते हैं, पांच-पांच विषयों में एमए करने वाला स्कॉलरबस ड्राईवर बनकर रिटायर हो जाता है. भारत प्रवास के दौरान फैज़ अहमद फैज़ का हस्त-लिखित काव्य-संग्रह रात को ही कोई उड़ाकर चम्पत हो जाता है. यह सब होता रहता है, ऐसा आगे भी होता रहेगा. हम कुछ नहीं कर पाएंगे क्योंकि हमें शोर मचाना नहीं अत है. -Dr. RANJAN ZAIDI

subh said...

वो ससुर का नाती आशाराम भी सम्मानित व्यक्ति था,निकला बलात्कारी और जिसे इंद्र भगवान कह उसने भी गौतम ऋषि की पत्नी के साथ बलात्कार किया था।तो क्या जो महेंद्र यादव जी ने इतनी महत्वपूर्ण जानकारी दी है उसमे कुछ तो सच्चाई होगी इसमे सावधान या कुचेष्टा की धमकी देने कोई पुरानी की गई करतूत छिप नही सकती अगर गलत बात है तो यादव जी को चेलेंज करो कोर्ट में के फूफा सुफ़ा की बात से कुछ जोन वाला नही है।
अच्छा दोनों बुद्धिजीवी मेरे एक सवालोन का जवाब दो जो प्रामाणिक तौर पर इसका उत्तर सही देगा हम उसके फेवर की बात करेंगे।
प्रश्न:-1- क्या बचपन में हनुमान जी ने सूर्य को फल समझ कर मुहँ में दे लिया थ?और क्या ये संम्भव था?
प्रश्न:-2-क्या बाहमण ब्रह्मा के मुख से,क्षत्रिय भुजाओं से,वैश्य नाभि से उत्तपन हुए है? शूद्रों का तो मुझे पता ये वही से पैदा करते हैं और होते हैं जहाँ से ये शुद्र अब सभी को पैदा कर रहे हैं अगर हाँ तो ये तीनों वर्ण अब उस रास्ते से क्यों पैदा हो रहे जहाँ से शुद्र पैदा होते है।

subh said...

यादव जी को धमकी देने से सच्चाई तो छुप ना सकेगी कुछ तो बात है जो यादव जी ने लिखी है इनके पास प्रमाण जरूर होंगे यादव जी आप सच का खुलासा जरूर करें।भेड़ के फुफाओं से विचलित होने की कोई जरुरत नही है मुझे तो इन लोगों पर पहले से ही विश्वाश नही है ।ये तो समाज को बहकाते ही आ रहे हैं।हसनुमान जी के बचपन में ही सूर्य को फल समझ कर सटकने की झूठी खानी बाह मनो

Roahan said...

aise kutto se bharat ratn award vapis Lena chahie

Kiran Wathore said...

यादव साहब सच दुनिया मानती नहीं। लेकिन शुक्रिया आपका सच दुनिया के सामने लाने के लिए दिल से

Anonymous said...

श्रीमान सत्य आज का हो या कल का सत्य सत्य ही रहता है भ्रष्टाचार भ्रष्टाचारियों की वकालत करने में भी होता है श्रीमान और हमें यकीन है वह आपके मामा नहीं थे

Bharat Nishad said...

SACH HI TOH KADAVA LAGTA HAI INKO AABKI SAB MITHA HAI TABHI TOH DIABETES KI SHIKAYAT INHI LGON KO JAYADA RAHTI HAI

Ravindra Nath said...

Nice information yadav jee.we are very much proud of you.

GULKAND said...

बडी शर्म की बात है ....

GULKAND said...

बडी शर्म की बात है ....

-प्रवीण बा. हटकर

Unknown said...

सर्वपल्ली राधाक्रूनन के बारे में मैने भी कभी ये सिवा था। आज नमस्कार से पडा। बडी चौकनी बात है।
इस के साथ मे मैने ऐसा पढा हैं की, सर्वपल्ली राधाक्रूनन का गर्ल-स्टुडंट्स के साथ बर्ताव कुछ ठीक नाही था। इस के बारे पुष्टीर्थ लिखा था की ए सब इनके लडके ने खुद लिखा है।
सच याने Fact कभी ना कभी सामने आता ही है।
मतलब की बात ये है की आगली पिढीयां जब ये जान जायेगी तो हमारे एेसे आदर्शपर हंसेगी जरूर।
किसीके नाम पे शिक्षक दिवस मनाना जरूरी नही है। ऐसा चलता रहा तो शिक्षकी पेशा रहने के बजाय रोजगार बन के रहेगा।..... वैसा आजका चित्रा सुस्पष्ट दिख हि रहा हैं।
.... डॉ. पी ही लांडगे

Ashok Ahire Jalgaon said...

Yadav sahab, if you are sure that, the content is worthy then file a WP which will confirm/correct the historical scenario...

Unknown said...

सर्वपल्ली राधाक्रूनन के बारे में मैने भी कभी ये सुना था। आज विस्तार से पडा। बडी चौकनी बात है।
इस के साथ मे मैने ऐसा पढा हैं की, सर्वपल्ली राधाक्रूनन का गर्ल-स्टुडंट्स के साथ बर्ताव कुछ ठीक नाही था। इस के बारे पुष्टीर्थ लिखा था की ए सब इनके लडके ने खुद लिखा है।
सच याने Fact कभी ना कभी सामने आता ही है।
मतलब की बात ये है की आगली पिढीयां जब ये जान जायेगी तो हमारे एेसे आदर्शपर हंसेगी जरूर।
किसीके नाम पे शिक्षक दिवस मनाना जरूरी नही है। ऐसा चलता रहा तो शिक्षकी पेशा रहने के बजाय रोजगार बन के रहेगा।..... वैसा आजका चित्रा सुस्पष्ट दिख हि रहा हैं।
.... डॉ. पी बी लांडगे

dayashil said...

ये पोस्ट तो जादा से जादा लोगो तक पहुँचना चाहीये
शुक्रिया सरजी आपका धन्यवाद ..

Bhagchand gomal said...

मित्र, इस देश में पढ़ने-लिखने की संस्कृति नहीं है. 'चोरी और जुगाड़' प्रकृति है. क्या विश्वास करोगे कि गीतांजलि का मूल रचयिता कौन था? क्या विश्वास करोगे कि प्रेम चंद साहित्य के एक विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर (दिल्ली) का सारा साहित्य अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डीलिट एवर्डेड शोध ग्रन्थ की चोरी का है. दिल्ली विश्वविद्यालय में चोरी का कारोबार पुराना है. कहाँ तक शोर मचाएंगे. झूठी डिग्रियों के नाम पर चोर मंत्री बन जाते हैं, पांच-पांच विषयों में एमए करने वाला स्कॉलरबस ड्राईवर बनकर रिटायर हो जाता है. भारत प्रवास के दौरान फैज़ अहमद फैज़ का हस्त-लिखित काव्य-संग्रह रात को ही कोई उड़ाकर चम्पत हो जाता है. यह सब होता रहता है, ऐसा आगे भी होता रहेगा. हम कुछ नहीं कर पाएंगे क्योंकि हमें शोर मचाना नहीं अत है

Anonymous said...

वो ससुर का नाती आशाराम भी सम्मानित व्यक्ति था,निकला बलात्कारी और जिसे इंद्र भगवान कह उसने भी गौतम ऋषि की पत्नी के साथ बलात्कार किया था।तो क्या जो महेंद्र यादव जी ने इतनी महत्वपूर्ण जानकारी दी है उसमे कुछ तो सच्चाई होगी इसमे सावधान या कुचेष्टा की धमकी देने कोई पुरानी की गई करतूत छिप नही सकती अगर गलत बात है तो यादव जी को चेलेंज करो कोर्ट में के फूफा सुफ़ा की बात से कुछ जोन वाला नही है।
अच्छा दोनों बुद्धिजीवी मेरे एक सवालोन का जवाब दो जो प्रामाणिक तौर पर इसका उत्तर सही देगा हम उसके फेवर की बात करेंगे।
प्रश्न:-1- क्या बचपन में हनुमान जी ने सूर्य को फल समझ कर मुहँ में दे लिया थ?और क्या ये संम्भव था?
प्रश्न:-2-क्या बाहमण ब्रह्मा के मुख से,क्षत्रिय भुजाओं से,वैश्य नाभि से उत्तपन हुए है? शूद्रों का तो मुझे पता ये वही से पैदा करते हैं और होते हैं जहाँ से ये शुद्र अब सभी को पैदा कर रहे हैं अगर हाँ तो ये तीनों वर्ण अब उस रास्ते से क्यों पैदा हो रहे जहाँ से शुद्र पैदा होते है।

Shailendra Dhaddha said...

good information

Mahendra Yadav said...

जिनको और ज्यादा प्रमाण चाहिए हों, वे इस लिंक पर पा सकते हैं।-Mahendra Narayan Singh Yadav.

http://roundtableindia.co.in/index.php?option=com_content&view=article&id=8753:dr-sarvepalli-radhakrishnan-the-teacher-who-plagiarised-his-student-s-thesis&catid=119:feature&Itemid=132

mahendra said...
This comment has been removed by the author.
Jagdish Chandra said...

महोदय,
डॉ, राधाकृष्णन की पुस्तक के बारे में आपका लेख पढा, अत्यन्त

Mohit Nigam said...

Mere khud k research k baad bade dukh k saath kahena pad rha hai.Ye sab bakwas hai. Kolkata highcourt me kabhi aisa koi case nhi hua... agar hua toh yadav ji vinamra nivedan hai ki us case ka citation bataye. Ya kabhi bhi is prakar k kisi court case ka koi bhi chhota se chhota kagaj prastut kare.
Kisi bhi mahan vyakti pe aarop lagana bharat me naya nhi hai....

Anil Maheshwari said...

यही होता आया है, यही हो रहा है, हमारे देश में,
काश हम सब एक होते।

Karuna Asware said...

Agar ye kahi baat mai sachai hai... Tab iska praman bhi dena hota hai... Agar aap ye de do tho... Satya kabhi chupta nahi... Ye bhi sidha hoga... So pls. Share with us in details everything.